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जातीय चेतना बनाम ‘पंचलाइट’ / डॉ.निम्मी ए.ए.

                                                                                                         जातीय चेतना बनाम ‘पंचलाइट’ डॉ . निम्मी ए.ए फणीश्वर नाथ रेणु जी भारतीय जन जीवन के बहुत बड़े कथाकार हैं। काबिलेगौर है कि उन्होंने गँवई अंदाज़ में जो कुछ कहा, वह भारतवर्ष के तमाम गाँवों की कथा बन गयी। रेणु के कथा लेखन का समय नई कहानी आंदोलन का समय था। फ़िलहाल लंबा समय बीत जाने के बावजूद रेणु को आँचलिक कहानीकार के खेमे में डालना नासमझी है। बल्कि कहना चाहिए कि वे नयी कहानी के उन कथाकारों में हैं जो कहानी में अभिजनवाद से पृथक रहकर अपने समय और समाज के खुरदरे यथार्थ को चित्रित करने में माहिर थे। लिहाज़ा अमरकान्त , कमलेश्वर , राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और भीष्म साहनी के साथ उन्हें भी नई कहानी के उन कथाकारों में मान्यता देने की दरकार...

कबीर की सांस्कृतिक समझ और हिन्दी साहित्य / डॉ.निम्मी ए.ए

    कबीर की सांस्कृतिक समझ और हिन्दी साहित्य  डॉ . निम्मी ए.ए ‘ मेहनत और प्रेम पर आधारित जीवन से अलग होने के अर्थ में ‘ साधना ’ शब्द का कबीर केलिए कोई अर्थ नही। कोई साधना नहीं है कबीर के पास आपको सिखाने केलिए – सिवाय प्रेम और श्रम पर आधारित जीवनयापन के। सिवाय जिज्ञासा और विवेक के। सिवाय सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभव की द्वन्द्वात्मक वेदना को साधने के। कबीर मनुष्य मात्र केलिए प्रामाणिक , समग्र और सम्मानपूर्ण जीवन के खोजी हैं – पुरानी या नई धर्मसत्ता के संस्थापक नहीं ’ [i] ।    पाँच सौ वर्ष पहले जिन विचारों को कबीर ने अपने समाज के समक्ष रखा था , आज के संदर्भ में उन विचारों के पुनरचिंतन , पुनर्विचार या पुनर्मूल्यांकन की अहमियत ज़्यादा है। चूंकि कबीर के समय से भी विकराल व बीहड़ समय से फिलहाल हम गुज़र रहे हैं। प्रेमचंद ने अपने निबंध संग्रह ‘ कुछ विचार ’ में साहित्यकर के उत्तरदायित्व के बारे में लिखा था - ‘ साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है , वह देश – भक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली सचाई भी नहीं , बल्कि उनके आगे मशाल...