‘ नारी! तुम केवल श्रद्धा हो। विश्वास र ज त नग पग तल में , पीयू ष स्रोत सी बहा करो। जीवन के सुंदर समतल में ’ । जयशंकर प्रसाद ने स्त्री को शक्ति , सौंदर्य , श्रद्धा और शांति का प्रतिरूप माना था। किसी भी राष्ट्र की संस्कृति , सभ्यता और उन्नति का आकलन उस देश की महिलाओं से किया जाता है। स्त्री का मूल्यांकन इससे खूबसूरत शायद ही हो सकता है। आज का उत्तर आधुनिक युग स्त्री विमर्श का है। फिलहाल समय में , समाज और साहित्य के ऐतिहासिक संदर्भों में भारतीय स्त्री की हालत के विश्लेषण की अहमियत ज़्यादातर बढ़ गयी है। स्त्री वादी आंदोलन विश्वस्तर पर चल रहे हैं , स्त्री अस्मिता और स्त्री अस्तित्व की पहचान केलिए स्त्री विमर्श चल रहे हैं जो कि गौरतलब है। विमर्श का अर्थ है जीवंत बहस। यानी कि किसी भी समस्या या स्थिति को एक कोण से न देखकर भिन्न मानसिकताओं , दृष्टियों और वैचारिक प्रतिबद्धताओं का समाहार करते हुए उलट-पुलट कर देखना और उसे समग्रता में समझने की कोशिश करना। हिन्दी में विमर्श शब्द अँग्रेजी के डिस्कोर्स शब्द से आया , जि...
आज साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विमर्शों में स्त्री विमर्श का विशेष महत्व है | स्त्री विमर्श से तात्पर्य स्त्री को केन्द्र में रखकर समाज , संस्कृति , परंपरा , एवं इतिहास का पुनरीक्षण करके स्त्री की स्थिति पर मानवीय दृष्टि से विचार करना है | दरअसल हाशियेकृत स्त्री एवं पददलित जन समूह का मुख्य धारा के केन्द्र में आने का संघर्ष ही इसका निदान है | इक्कीसवीं शताब्दी के हिन्दी उपन्यासों में स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व व अस्मिता की तलाश जारी है | अतएव स्त्री और पुरुष को समाज और परिवार की अनिवार्य इकाई मानकर आपस में समादृद समंजन स्थापित करने की चेष्टा हो रही है इन कोशिशों में महिला उपन्यासकारों की भूमिका सराहनीय है | शायद लोहे का स्वाद लुहार की अपेक्षा वह घोड़ा जानता है जिसके मुंह में लगाम है | यानी कि भुगतनेवाला ही उसका दर्द बेहतर समझ सकता है | उषा प्रियंवदा , मन्नू भंडारी , कृष्णा सोबती , मृदुला गर्ग , मैत्रेयी पुष्पा , चित्रा मुद्गल , अनामिका , सूर्यबाला , अल्का सरावगी , प्रभा खेतान आदि की रचनाओं को देखकर यह बात जाहीर हो जा...
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