कबीर की सांस्कृतिक समझ और हिन्दी साहित्य / डॉ.निम्मी ए.ए
कबीर की सांस्कृतिक समझ और हिन्दी साहित्य डॉ . निम्मी ए.ए ‘ मेहनत और प्रेम पर आधारित जीवन से अलग होने के अर्थ में ‘ साधना ’ शब्द का कबीर केलिए कोई अर्थ नही। कोई साधना नहीं है कबीर के पास आपको सिखाने केलिए – सिवाय प्रेम और श्रम पर आधारित जीवनयापन के। सिवाय जिज्ञासा और विवेक के। सिवाय सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभव की द्वन्द्वात्मक वेदना को साधने के। कबीर मनुष्य मात्र केलिए प्रामाणिक , समग्र और सम्मानपूर्ण जीवन के खोजी हैं – पुरानी या नई धर्मसत्ता के संस्थापक नहीं ’ [i] । पाँच सौ वर्ष पहले जिन विचारों को कबीर ने अपने समाज के समक्ष रखा था , आज के संदर्भ में उन विचारों के पुनरचिंतन , पुनर्विचार या पुनर्मूल्यांकन की अहमियत ज़्यादा है। चूंकि कबीर के समय से भी विकराल व बीहड़ समय से फिलहाल हम गुज़र रहे हैं। प्रेमचंद ने अपने निबंध संग्रह ‘ कुछ विचार ’ में साहित्यकर के उत्तरदायित्व के बारे में लिखा था - ‘ साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है , वह देश – भक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली सचाई भी नहीं , बल्कि उनके आगे मशाल...