दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन / डॉ.निम्मी ए.ए.

                                                                                      

    दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन के प्रारंभिक विकास में दो प्रमुख भक्त-परंपराओं का विशेष योगदान रहा।  -

आलवार  -  वैष्णव भक्त।
नयनार/नायनमार - शैव भक्त। 


इन दोनों परंपराओं ने दक्षिण भारत में भक्ति को लोकजीवन से जोड़ा और आगे चलकर भारत के व्यापक भक्ति आंदोलन के विकास के लिए आधारभूमि तैयार की।

आलवार दक्षिण भारत के प्रमुख वैष्णव भक्त-कवि थे। ‘आलवार’ शब्द तमिल भाषा के ‘आळ’ धातु से संबंधित माना जाता है, जिसका अर्थ है - मग्न - ईश्वर के प्रेम और ध्यान में पूर्णतः डूबा हुआ व्यक्ति। आलवार भक्त भगवान विष्णु के अनन्य उपासक थे। वे विष्णु को भगवान, वासुदेव, नारायण आदि नामों से संबोधित करते थे। इन भक्तों ने दक्षिण भारत में भक्ति की ऐसी भावधारा विकसित की, जिसने आगे चलकर भारतीय भक्ति आंदोलन को व्यापक आधार प्रदान किया। समय - 6ठी से 9वीं शताब्दी के बीच।  

1. आलवार भक्ति की प्रमुख विशेषता

आलवारों की भक्ति केवल शास्त्रों और कर्मकांडों तक सीमित नहीं थी। उनके लिए ईश्वर की प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग प्रेम, श्रद्धा, समर्पण और शरणागति था। उन्होंने यह संदेश दिया कि भगवान की प्राप्ति के लिए जाति, वर्ग, विद्वत्ता अथवा जटिल धार्मिक अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं है। सच्चे प्रेम और निष्कपट समर्पण से प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर के निकट पहुँच सकता है। उन्होंने वेद, उपनिषद, गीता से ग्रहीत भक्ति भावों को गीतों केआर माध्यम से जनता तक पहुंचाया। 

इस प्रकार उन्होंने भक्ति को जनसाधारण से जोड़कर उसका सार्वभौमिक स्वरूप प्रस्तुत किया।

2. ‘दिव्य प्रबंधम्’ का महत्त्व

आलवार भक्तों ने तमिल भाषा में बड़ी संख्या में भक्ति-पदों (गीत) की रचना की। प्रारंभ में ये पद मुख्यतः मौखिक परंपरा के माध्यम से सुरक्षित रहे। बाद में श्री नाथमुनि ने इन पदों का संकलन और व्यवस्थित संपादन किया। यह संग्रह ‘नालायिर दिव्य प्रबंधम्’ या ‘दिव्य प्रबंधम्’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसमें लगभग चार हजार पावन पद हैं।

इसी कारण इसे ‘तमिल वेद’ भी कहा गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि आलवारों ने संस्कृत की शास्त्रीय परंपरा के साथ-साथ लोकभाषा तमिल को भी धार्मिक और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति का महत्त्वपूर्ण माध्यम बनाया।

3. भक्ति को भावात्मक और आकर्षक रूप प्रदान करना

आलवारों का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने भक्ति को केवल वैधी या विधि-विधान आधारित भक्ति न रहने देकर उसे भावमूलक और प्रेमप्रधान भक्ति का स्वरूप प्रदान किया।

उन्होंने भक्त और भगवान के संबंध को अनेक मानवीय भावों के माध्यम से व्यक्त किया—

  • दास्य भाव — भक्त स्वयं को भगवान का सेवक मानता है।

  • सख्य भाव — भगवान को अपना मित्र मानकर उनसे आत्मीय संबंध स्थापित करना।

  • वात्सल्य भाव — भगवान के प्रति माता-पिता जैसा स्नेह रखना।

  • मधुर भाव — भगवान को प्रियतम मानकर प्रेम करना।

  • कांता भाव — भगवान के प्रति प्रेमिका या पत्नी जैसा अनुराग।

  • दांपत्य भाव — जीव और परमात्मा के संबंध को पति-पत्नी के आत्मीय संबंध के रूप में देखना।

इन भावों ने भक्ति को अत्यंत सरस, मानवीय और हृदयस्पर्शी बनाया।

4. वैधी भक्ति से रागानुगा भक्ति की ओर

आलवारों ने उस भक्ति-परंपरा को नया रूप दिया जो मुख्यतः यज्ञ, पूजा, कर्मकांड और धार्मिक विधि-विधान पर आधारित थी। उन्होंने भक्ति को बाहरी अनुष्ठानों से हटाकर हृदय की अनुभूति और प्रेम से जोड़ने का प्रयास किया।

उनके लिए भगवान की भक्ति किसी निश्चित कर्मकांड का पालन मात्र नहीं थी, बल्कि भगवान के प्रति उत्पन्न होने वाला स्वाभाविक प्रेम और अनुराग थी। इस प्रकार उन्होंने रागानुगा भक्ति की भावना को बल दिया।

5. भक्त और परमात्मा के बीच दांपत्य भाव

आलवार साहित्य में भक्त और भगवान के बीच अत्यंत आत्मीय संबंध दिखाई देता है। विशेष रूप से महिला भक्त गोदा देवी/आंडाल की भक्ति में भगवान के प्रति दांपत्य और मधुर भाव अत्यंत प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुआ है। आंडाल ने स्वयं को भगवान विष्णु की प्रेमिका और वधू के रूप में अनुभव किया। इससे यह धारणा मज़बूत हुई कि जीवात्मा और परमात्मा का संबंध अत्यंत आत्मीय और प्रेमपूर्ण हो सकता है। इस भावधारा ने बाद की वैष्णव भक्ति परंपरा को गहराई से प्रभावित किया।

6. कर्मकांड से मुक्ति और भावभक्ति

आलवारों ने भक्ति को केवल यज्ञादि कर्मों और विधि-विधानों तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने सामान्य मनुष्य के दुःख, प्रेम, विरह, आशा और समर्पण को भक्ति का आधार बनाया।

उनके पदों में भगवान के प्रति प्रेम, विरह, मिलन की आकांक्षा और पूर्ण समर्पण की अनुभूति मिलती है। इससे भक्ति दार्शनिक अवधारणा न रहकर जीवन का भावनात्मक अनुभव बन गई।

7. जनसाधारण के बीच भक्ति का प्रचार

आलवारों ने एकांत साधना को ही अपना लक्ष्य नहीं बनाया। वे विभिन्न स्थानों और विष्णु के पवित्र मंदिरों में जाकर भगवान की महिमा का गान करते थे। उन्होंने भक्ति को जनता के बीच पहुँचाया।

इससे भक्ति किसी विशेष वर्ग या विद्वानों की संपत्ति न रहकर सामान्य जन की आध्यात्मिक शक्ति बन गई। उनके पद मंदिरों में गाए जाते थे और इस प्रकार संगीत, काव्य और भक्ति का सुंदर समन्वय स्थापित हुआ।

8. शरणागति और प्रपत्ति का सिद्धांत

आलवार भक्ति का एक महत्त्वपूर्ण तत्व है - शरणागति या प्रपत्ति। इसका अर्थ है अपने अहंकार को त्यागकर पूर्ण रूप से भगवान की शरण में जाना।

भक्त अपने जीवन और अस्तित्व को भगवान को समर्पित करता है और उनके अनुग्रह को मुक्ति का आधार मानता है। इस विचार ने आगे चलकर श्रीवैष्णव दर्शन में विशेष महत्त्व प्राप्त किया।

9. सामाजिक दृष्टि से योगदान

आलवारों की भक्ति का महत्त्व केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। उन्होंने भक्ति के द्वार को जाति और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठाकर व्यापक बनाया। विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के भक्तों की उपस्थिति ने यह संदेश दिया कि ईश्वर की दृष्टि में भक्ति ही प्रमुख है।

इस प्रकार आलवारों ने सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक समानता की भावना को मजबूत किया। उनकी भक्ति में लोककल्याण और मानवीय संवेदना का महत्त्वपूर्ण स्थान था।

10. लोकभाषा को धार्मिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाना

आलवारों का एक बड़ा योगदान तमिल भाषा को भक्ति की भाषा बनाना था। उन्होंने कठिन दार्शनिक अवधारणाओं को लोकभाषा में सरल और भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया।

इससे धार्मिक और आध्यात्मिक विचार आम जनता तक आसानी से पहुँचे। आगे चलकर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में संतों ने अपनी-अपनी लोकभाषाओं में भक्ति साहित्य की रचना की। इस दृष्टि से आलवार परंपरा भारतीय लोकभाषा-आधारित भक्ति आंदोलन की महत्त्वपूर्ण पूर्वपीठिका मानी जा सकती है।

11. नवजागरण की चेतना

आलवारों ने दक्षिण भारत में धार्मिक और सामाजिक चेतना के एक नए वातावरण का निर्माण किया। उन्होंने रूढ़ धार्मिकता के स्थान पर प्रेम, करुणा, समर्पण और मानवीय संबंधों पर आधारित भक्ति को महत्त्व दिया।

उनकी भक्ति ने समाज में एक प्रकार की आध्यात्मिक नवचेतना उत्पन्न की। इसी कारण आलवार परंपरा को दक्षिण भारत के भक्ति-नवजागरण की एक महत्त्वपूर्ण धारा माना जाता है।

श्री नाथमुनि का योगदान

श्री नाथमुनि दक्षिण भारत की वैष्णव भक्ति परंपरा के अत्यंत महत्त्वपूर्ण आचार्य माने जाते हैं। उनका काल सामान्यतः नवीं शती के उत्तरार्द्ध से दसवीं शती के पूर्वार्द्ध तक माना जाता है। वे संस्कृत और तमिल दोनों भाषाओं के प्रकांड विद्वान थे। आलवारों की भक्ति-परंपरा को व्यवस्थित रूप देने और उसे श्रीवैष्णव परंपरा में प्रतिष्ठित करने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

1. नालायिर दिव्य प्रबंधम् का संकलन और संपादन

आलवार भक्तों के पद लंबे समय तक मौखिक परंपरा में प्रचलित थे। श्री नाथमुनि ने इन बिखरे हुए पदों को खोजकर, संकलित और व्यवस्थित किया। इस प्रकार ‘नालायिर दिव्य प्रबंधम्’ का सुव्यवस्थित रूप सामने आया, जिसमें लगभग चार हजार तमिल भक्ति-पद हैं।

इसी कारण नाथमुनि को आलवार साहित्य को सुरक्षित, व्यवस्थित और संस्थागत स्वरूप प्रदान करने वाला प्रमुख आचार्य माना जाता है।

2. मंदिरों में आलवार पदों की गायन-परंपरा

नाथमुनि ने आलवारों के पदों को केवल साहित्यिक रचनाओं के रूप में सुरक्षित नहीं रखा, बल्कि उन्हें मंदिरों की उपासना-पद्धति का अंग बनाया। उन्होंने इन पदों के नियमित और निश्चित गायन की व्यवस्था की।

आलवारों के पद मंदिरों में विशेष संगीतात्मक पद्धति से गाए जाने लगे। इस प्रकार तमिल भक्ति-काव्य और मंदिर-उपासना के बीच गहरा संबंध स्थापित हुआ।

3. मंदिर-उपासना में परिवर्तन

नाथमुनि के प्रयासों से वैष्णव मंदिरों की उपासना-पद्धति में एक प्रकार का शांतिपूर्ण और रचनात्मक परिवर्तन आया। संस्कृत में उपलब्ध वैदिक एवं आगमिक परंपरा के साथ तमिल भक्ति-पदों को भी धार्मिक अनुष्ठान में प्रतिष्ठा मिली।

इससे मंदिर केवल कर्मकांड का केंद्र न रहकर भक्ति, संगीत और सामूहिक धार्मिक अनुभव का केंद्र भी बन गया।

4. कर्म और भक्ति का समन्वय

नाथमुनि की विशेषता थी कि उन्होंने कर्म और भक्ति को परस्पर विरोधी न मानकर उनमें समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। उनके माध्यम से वैदिक परंपरा और आलवारों की भावप्रधान भक्ति के बीच एक सेतु निर्मित हुआ।

इस प्रकार ‘वेद’ और ‘लोक’, संस्कृत और तमिल, तथा शास्त्र और भक्ति के बीच सामंजस्य स्थापित हुआ।

5. लोक और वेद का समन्वय

नाथमुनि के योगदान का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष लोक और वेद का समन्वय था। संस्कृत की वैदिक परंपरा जहाँ विद्वान और धार्मिक वर्ग से अधिक जुड़ी हुई थी, वहीं आलवारों की तमिल रचनाएँ सामान्य जनता के लिए अधिक सहज थीं।

नाथमुनि ने दोनों धाराओं को एक-दूसरे का विरोधी न मानकर एक ही आध्यात्मिक परंपरा के पूरक रूप में प्रतिष्ठित किया। इससे वैष्णव भक्ति को व्यापक सामाजिक आधार मिला।

6. भक्ति मार्ग की व्यापकता

नाथमुनि की परंपरा ने भक्ति को सामाजिक सीमाओं से ऊपर उठाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भक्ति के मार्ग को विभिन्न सामाजिक वर्गों, स्त्री-पुरुष तथा सामान्य जन के लिए अधिक सुलभ बनाया गया।

यहाँ उनका योगदान केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है।

7. उत्तर भारत में भक्ति-विचारों का प्रसार

परंपरा में यह भी उल्लेख मिलता है कि नाथमुनि ने उत्तर भारत की यात्रा की और वहाँ वैष्णव भक्ति के सिद्धांतों का प्रचार किया। इस प्रकार दक्षिण भारत की वैष्णव भक्ति-परंपरा के विचारों के व्यापक प्रसार की दिशा में भी उनका योगदान माना जाता है।

आलवार भक्त : इनकी संख्या 12 मानी गयी हैं। 

(1) सरोयोगी (पोयगैआलवार), (2) भूतयोगी (भूतत्तालवार), (3) महत्योगी (पेय आलवार), (4) भक्तिसार (तिरुमडिसै आलवार), (5) शठकोप या परांकुश मुनि (नम्म आलवार), (6) मधुर कवि, (7) कुलशेखर, (8) विष्णुचित्त (परि आलवार), (9) गोदा या रंगनायकी (आंडाल), (10) विप्रनारायण या भक्तपदरेणु (तोंडर डिप्पोलि), (11) योगवाह या मुनिवाहन (तिरुप्पन), (12) परकाल या नीलन्‌ (तिरुमंगैयालवार) 

इस प्रकार आलवार भक्तों का योगदान भारतीय भक्ति परंपरा के विकास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने भक्ति को कर्मकांड से निकालकर प्रेम और भाव की भूमि पर प्रतिष्ठित किया, उसे लोकभाषा से जोड़ा और सामान्य जन के लिए सुलभ बनाया। शरणागति, प्रपत्ति, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर और दांपत्य भावों के माध्यम से उन्होंने भक्त और भगवान के बीच आत्मीय संबंध स्थापित किया।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आलवारों ने भक्ति का द्वार समूचे मानव समाज के लिए खोल दिया। उनकी भक्ति में धार्मिकता के साथ-साथ प्रेम, समानता, लोकमंगल और मानवीय संवेदना का समन्वय दिखाई देता है। इस दृष्टि से आलवार केवल वैष्णव भक्त-कवि ही नहीं, बल्कि भारतीय भक्ति आंदोलन के प्रारंभिक और प्रभावशाली जनजागरणकारी व्यक्तित्व भी थे।


नयनार/नायनमार 

नायनमार (समर्पित)  तमिल भाषा के प्रसिद्ध शैव भक्त संत थे, जो भगवान शिव के उपासक और अपनी भक्ति-भावना के लिए प्रसिद्ध हैं। नायनमारों की संख्या 63 मानी जाती है। उनका काल मुख्यतः छठी से आठवीं शताब्दी के बीच माना जाता है। नयनार संत  सभी जातियों से संबंध रखते थे। प्रमुख नायनमारों में अप्पर (तिरुनावुक्करसर), तिरुज्ञानसंबंदर, और माणिक्कवसागार और सुंदरर शामिल हैं, जबकि करैक्काल अम्मैयार प्रमुख महिला नायनमार थीं। नायनमारों को पल्लव तथा बाद में चोल शासकों का संरक्षण प्राप्त हुआ, जिसके कारण दक्षिण भारत में शैव धर्म और मंदिर संस्कृति का व्यापक विकास हुआ। महेंद्रवर्मन प्रथम के शासनकाल में शैव धर्म को महत्वपूर्ण राजकीय संरक्षण मिला तथा बाद के शासकों ने भी अनेक शिव मंदिरों के निर्माण और संरक्षण में योगदान दिया।

    नायनमार संतों की रचनाओं का संकलन नंबि आण्डार नंबि ने 10वीं–11वीं शताब्दी में किया, जो आगे चलकर ‘तिरुमुरै’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ‘तिरुमुरै’ तमिल शैव भक्ति साहित्य का महत्वपूर्ण स्तोत्र-संग्रह है, जिसे दक्षिण भारत का ‘पाँचवाँ वेद’ भी कहा जाता है। यह बारह खंडों में विभक्त है। इसके पहले तीन खंडों में संत तिरुज्ञानसंबंदर के पद, चौथे से छठे खंड में संत अप्पर के पद तथा सातवें खंड में संत सुंदरर के पद संकलित हैं। आठवें से बारहवें खंडों में अन्य शैव संतों और कवियों की रचनाएँ शामिल हैं। 12वीं शताब्दी में सेक्किऴार (शेक्किलार) ने 63 नायनमार संतों के जीवन और उनकी शिव-भक्ति का वर्णन ‘पेरियपुराणम्’ में किया। इनके  भजनों का संकलन मुख्यतः तिरुवसंगम (मणिक्कव सागर) और तेवरम के रूप में है। तेवर का साम्य ‘देवग्रह’ से है अर्थात देवता का घर और ‘वरम’ एक देवता को संबोधित गीत है। ‘तेवरम का एक अर्थ 'निजी अनुष्ठान पूजा' भी है और इसमें भजनों का महत्व है, जो मुख्य रूप से मंदिर की पूजा से जुड़े थे। नायनमारों और उनकी रचनाओं ने तमिल शैव भक्ति आंदोलन, धार्मिक चेतना तथा तमिल साहित्य के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। 

निष्कर्ष

दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन केवल धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं था, बल्कि यह कर्मकांड, जातिगत भेदभाव और धार्मिक आडंबरों के विरुद्ध व्यक्तिगत भक्ति, समानता और मानवीयता की चेतना का भी वाहक बना। आलवार और नायनार संतों ने यह विचार स्थापित किया कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए जन्म, जाति या सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा, प्रेम और समर्पण आवश्यक है। उन्होंने लोकभाषा तमिल में भक्ति साहित्य की रचना करके धर्म को सामान्य जन के निकट पहुँचाया। इस प्रकार, दक्षिण भारत का भक्ति आंदोलन धार्मिक लोकतंत्रीकरण, सामाजिक समरसता और व्यक्तिगत आध्यात्मिक स्वतंत्रता की भावना को सुदृढ़ करने वाला महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन बना। 

 





 

 


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