‘नेपथ्य राग’ में स्त्री मानवाधिकार/ डॉ.निम्मी ए.ए.

 

मानवाधिकार मनुष्य के गरिमापूर्ण, स्वतंत्र और समान जीवन की आधारभूत शर्तें हैं। जीवन, समानता, स्वतंत्रता, शिक्षा, विचार, अभिव्यक्ति और निर्णय जैसे अधिकार किसी भी व्यक्ति की मानवीय गरिमा से जुड़े हैं। स्त्री भी पूर्ण मानव के रूप में इन सभी अधिकारों की समान अधिकारी है। फिर भी सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संरचनाओं में मौजूद पितृसत्तात्मक मानसिकता ने ऐतिहासिक रूप से स्त्री की स्वतंत्रता और अधिकारों को सीमित किया है। कभी उसे शिक्षा और ज्ञान से दूर रखा गया, कभी उसकी प्रतिभा को पुरुष के अधीन माना गया और कभी परिवार तथा सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर उसकी आवाज़ को नियंत्रित किया गया।

मीरा कांत का नाटक नेपथ्य राग’ (2004) इसी व्यापक संदर्भ में स्त्री मानवाधिकारों की दृष्टि से विचारणीय है। नाटक चौथी-पाँचवीं शताब्दी की विदुषी खना और आधुनिक कामकाजी स्त्री मेधा को समान वैचारिक धरातल पर रखकर यह प्रश्न उठाता है कि समय के परिवर्तन के बावजूद स्त्री को अपने मानवीय अधिकारों की पूर्ण स्वीकृति कितनी प्राप्त हुई है।

          नाटक की शुरुआत आधुनिक पात्र मेधा और उसकी माँ के संवाद से होती है। मेधा अपने कार्यालय में व्याप्त पुरुष-वर्चस्व से पीड़ित और परेशान है। उसकी मानसिक स्थिति को समझते हुए उसकी माँ उसे बहलाने और उसके भीतर अपने अधिकारों के प्रति चेतना तथा आत्मविश्वास जगाने के लिए खना की कहानी सुनाती है। अतः नाटक का केंद्र विदुषी खना है। खना अपने काका सुबन्धु भट्ट के साथ विद्या और ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त करने के लिए सुविख्यात ज्योतिशाचार्य एवं चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों से एक वराहमिहिर से दीक्षा लेने आती है। उसकी प्रतिभा, ज्ञान-पिपासा और बौद्धिक जिज्ञासा से प्रभावित होकर वह वराहमिहिर के ज्ञान-परिवेश का हिस्सा बनती है। इसी दौरान वराहमिहिर का पुत्र पृथुयशस खना के प्रति आकर्षित होता है और अंततः दोनों का विवाह हो जाता है। विवाह के बाद भी खना की ज्ञान-साधना और अपनी स्वतंत्र बौद्धिक पहचान बनाए रखने की आकांक्षा समाप्त नहीं होती। वह पुरुष-प्रधान विद्वत्समाज में अपनी प्रतिभा के आधार पर स्थान प्राप्त करना चाहती है।

          इसी क्रम में एक दिन मालव गणराज्य के नरेश चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, कई दिनों से वराहमिहिर को राजसभा में न देखकर, प्रच्छन्न वेश धारण करके उनसे मिलने उनके घर आते हैं। वहाँ उनकी भेंट खना से होती है।  राजा खना की भविष्यवाणी और ज्योतिषीय ज्ञान से प्रभावित होकर उसे राजमहल में आमंत्रित करते हैं। वहाँ खना रानी महादेवी से संवाद करती है। उसकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर राजा उसे अपने नवरत्नों की सभा में सभासद के रूप में प्रतिष्ठित करने की इच्छा व्यक्त करते हैं। किंतु राजा के इस निर्णय से नवरत्न में से कोई सहमत नहीं होता और खना के ससुर वराहमिहिर भी इसका मन-ही-मन विरोध करते हैं। पुरुष-प्रधान विद्वत्समाज के लिए एक स्त्री का नवरत्नों की सभा में प्रतिष्ठित होना अस्वीकार्य है। अंततः खना को सभा में स्थान देने के प्रश्न को उसकी जीभ काट देने से जोड़ दिया जाता है और उसकी वाणी तथा स्वतंत्र अभिव्यक्ति को समाप्त करने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार खना की जीभ केवल बोलने की शक्ति का नहीं, बल्कि ज्ञान, विचार, अस्मिता, स्वतंत्रता और स्त्री के अभिव्यक्ति-अधिकार का प्रतीक बन जाती है। नाटक में खना के माध्यम से स्त्री की प्रतिभा को स्वीकार करने और उसकी स्वतंत्र आवाज़ को स्वीकार करने के बीच मौजूद पितृसत्तात्मक विरोधाभास उजागर होता है। समकालीन स्त्री मेधा के जीवन-संघर्ष से खना की कथा को जोड़कर नाटक यह स्थापित करता है कि समय और परिस्थितियाँ बदलने के बावजूद स्त्री की समानता, सम्मान, स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार का संघर्ष निरंतर जारी है।

          नाटक में खना का ज्ञान-संघर्ष और मेधा का आधुनिक कार्यस्थलीय संघर्ष अलग-अलग समय की घटनाएँ होते हुए भी एक ही मूल समस्या की ओर संकेत करते हैं - स्त्री को मनुष्य के रूप में समान गरिमा, स्वतंत्र विचार, अपनी आवाज़ और निर्णय का अधिकार। इसलिए ‘नेपथ्य राग’ को स्त्री के मानवाधिकारों के ऐतिहासिक और समकालीन संघर्ष के रूप में पढ़ना अधिक सार्थक है।

स्त्री की समानता का अधिकार

          स्त्री मानवाधिकार का सबसे मूलभूत पक्ष समानता का अधिकार है। समानता का अर्थ केवल पुरुष और स्त्री के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि स्त्री की क्षमता और व्यक्तित्व को बिना लैंगिक भेदभाव के स्वीकार करना भी है। नाटक में खना का चरित्र इसी अधिकार की माँग को सामने लाता है। वह अपनी बौद्धिक क्षमता के कारण पुरुष विद्वानों के समान सार्वजनिक ज्ञान के क्षेत्र में स्थान प्राप्त करना चाहती है। उसकी प्रतिभा किसी भी दृष्टि से पुरुष विद्वानों से कम नहीं है, फिर भी उसके स्त्री होने को ही उसकी योग्यता के मार्ग में बाधा बनाया जाता है।

          राजसभा में खना को स्वीकार किए जाने का प्रश्न इस असमानता को स्पष्ट करता है। एक नवरत्न क्षपणक का कथन देखिए - “राजसभा में सभासद के रूप में एक स्त्री!....कभी कोई स्त्री नहीं रही”। पुरुष-प्रधान नवरत्नों का विरोध यह दर्शाता है कि स्त्री की प्रतिभा को स्वीकार करने और उसे पुरुष के समान बौद्धिक दर्जा देने में सामाजिक मानसिकता अभी भी बाधक है। इस प्रकार खना का संघर्ष समानता के अधिकार को केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यवहारिक प्रश्न बना देता है।

शिक्षा और ज्ञान का अधिकार

          मानवाधिकार की दृष्टि से शिक्षा व्यक्ति के व्यक्तित्व-विकास का आधार है। स्त्री को ज्ञान से वंचित करना उसके विकास के साथ-साथ उसके सामाजिक और बौद्धिक अधिकारों को भी सीमित करना है। खना का चरित्र इस संदर्भ में विशेष महत्त्व रखता है। एक साधारण ग्रामबाला होने के बावजूद उसमें ज्ञान के प्रति तीव्र जिज्ञासा है। वह वराहमिहिर की शिष्या बनती है और ज्योतिष तथा खगोलीय ज्ञान अर्जित करती है। उसका ज्ञान केवल व्यक्तिगत रुचि नहीं, बल्कि अपनी बौद्धिक क्षमता को विकसित करने के अधिकार की अभिव्यक्ति है। खना के माध्यम से नाटक यह स्थापित करता है कि ज्ञान किसी विशेष लिंग की संपत्ति नहीं है। स्त्री को शिक्षा प्राप्त करने और ज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान निर्मित करने का उतना ही अधिकार है जितना पुरुष को।

बौद्धिक स्वतंत्रता और समान अवसर

          शिक्षा प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। ज्ञान प्राप्त करने के बाद उसे स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने और सार्वजनिक जीवन में उसकी मान्यता प्राप्त करने का अधिकार भी आवश्यक है। यही प्रश्न खना के राजसभा प्रवेश के प्रसंग में सामने आता है। राजसभा सत्ता के साथ-साथ ज्ञान और बौद्धिक प्रतिष्ठा का केंद्र है। खना का वहाँ प्रवेश उसकी सार्वजनिक बौद्धिक उपस्थिति की आकांक्षा है। राजा विक्रमादित्य उसकी प्रतिभा और व्यावहारिक बुद्धि को पहचानते हैं। किंतु जब उसे सभा के रत्न के रूप में स्वीकार करने की संभावना उत्पन्न होती है, तब पुरुष सत्ता असहज हो जाती है। यह स्थिति बताती है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था कई बार स्त्री के ज्ञान को तभी तक स्वीकार करती है जब तक वह पुरुष सत्ता को चुनौती नहीं देता। स्त्री की बुद्धि प्रशंसा का विषय हो सकती है, लेकिन उसकी स्वतंत्र बौद्धिक सत्ता स्वीकार करना कठिन हो जाता है। इस प्रकार खना का संघर्ष समान बौद्धिक अवसर और सार्वजनिक जीवन में समान भागीदारी के अधिकार से जुड़ जाता है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता : ‘जिह्वा’ का प्रतीक

          यहाँ स्त्री मानवाधिकार का सबसे सशक्त प्रतीक खना की जिह्वा है। जिह्वा यहाँ केवल शरीर का अंग नहीं, बल्कि विचार, तर्क, असहमति और आत्म-अभिव्यक्ति की शक्ति का प्रतीक है। खना की जिह्वा काटे जाने से संबंधित लोककथात्मक आख्यानों के विभिन्न रूप मिलते हैं। नाटक इन आख्यानों को स्त्री की आवाज़ पर नियंत्रण के व्यापक प्रतीक के रूप में ग्रहण करता है। एक लोकमान्यता के अनुसार, खना की जिह्वा राजा अथवा पुरुष-प्रधान समाज द्वारा इसलिए काट दी गई कि उसकी भविष्यवाणियाँ पुरुष विद्वानों से श्रेष्ठ सिद्ध हो रही थीं - यह प्रत्यक्ष दमन का रूप है; दूसरी धारणा यह है कि पारिवारिक प्रतिष्ठा और सामाजिक दबाव के कारण खना ने अपने श्वसुर वराहमिहिर तथा परिवार को अपमान से बचाने के लिए स्वयं अपनी जिह्वा काट ली - यह पितृसत्तात्मक मूल्यों को आत्मसात करने की ओर संकेत करता है। इसके विपरीत मेधा की दादी की उक्ति - खना की जिह्वा तो स्वयं वराहमिहिर ने काट ली थी” - इस प्रतीक को अत्यंत तीव्र बना देती है। यहाँ गुरु और श्वसुर की दोहरी भूमिका के भीतर ज्ञान-सत्ता और पितृसत्ता का अंतर्विरोध दिखाई देता है। इस प्रकार जिह्वा का कटना स्त्री के विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के हनन का प्रतीक है। स्त्री को ज्ञान प्राप्त करने की अनुमति देना, लेकिन उस ज्ञान को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने से रोकना मानवाधिकार की दृष्टि से एक गंभीर विरोधाभास है।

गरिमा और स्वायत्तता का अधिकार

          स्त्री के मानवाधिकारों में उसकी मानवीय गरिमा और स्वायत्तता का विशेष स्थान है। स्त्री की पहचान को केवल पत्नी, बहू, माँ या परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़ देना उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व को सीमित करता है। खना विवाह के बाद भी अपनी बौद्धिक पहचान को बनाए रखना चाहती है। उसके लिए वैवाहिक संबंध महत्त्वपूर्ण हैं, किंतु वे उसकी संपूर्ण पहचान नहीं हैं। उसका व्यक्तित्व उसकी प्रतिभा, ज्ञान और स्वतंत्र चेतना से भी निर्मित होता है। इस संदर्भ में नाटक स्त्री-मुक्ति को परिवार या संबंधों के निषेध के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। बल्कि वह यह प्रश्न उठाता है कि क्या स्त्री संबंधों के भीतर रहते हुए भी अपने स्वत्व और निर्णय की स्वतंत्रता सुरक्षित रख सकती है? यही प्रश्न स्त्री की गरिमा और स्वायत्तता के अधिकार को केंद्र में लाता है।

सार्वजनिक जीवन में भागीदारी का अधिकार

          स्त्री का मानवाधिकार केवल निजी जीवन तक सीमित नहीं है। उसे ज्ञान, राजनीति, प्रशासन, संस्थाओं और अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों में समान रूप से भाग लेने का अधिकार है। खना का राजसभा में प्रवेश इसी अधिकार का प्रतीक है। उसका संघर्ष निजी उपलब्धि के लिए नहीं, बल्कि उस सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश के लिए है जहाँ निर्णय और ज्ञान की सत्ता केंद्रित है। नवरत्नों द्वारा उसे ‘मूक सभासद’ के रूप में स्वीकार करने की मानसिकता इस अधिकार का विडंबनापूर्ण रूप प्रस्तुत करती है। स्त्री को सभा में बैठने की अनुमति है, लेकिन बोलने की नहीं। यह दृश्य उपस्थिति और वास्तविक भागीदारी के बीच का अंतर है। नाटक इस प्रकार स्पष्ट करता है कि किसी संस्था में स्त्री की मात्र उपस्थिति समानता का प्रमाण नहीं है। वास्तविक समानता तभी होगी जब उसे बोलने, विचार रखने और निर्णय-प्रक्रिया में भाग लेने का समान अधिकार मिले।

कार्यस्थल पर समानता : मेधा का संघर्ष

          खना के ऐतिहासिक संघर्ष का आधुनिक विस्तार मेधा के चरित्र में दिखाई देता है। मेधा शिक्षित और कामकाजी स्त्री है। उसने आधुनिक समाज में शिक्षा और रोज़गार के माध्यम से अपनी स्वतंत्र पहचान निर्मित की है, फिर भी कार्यस्थल पर उसे लैंगिक असमानता और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है।           मेधा का अनुभव यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक युग में स्त्री मानवाधिकारों का प्रश्न केवल शिक्षा या रोज़गार प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। कार्यस्थल पर समान अवसर, सम्मान, सहयोग, निर्णय में भागीदारी और योग्यता के अनुरूप पहचान भी उसके अधिकार हैं। खना की जिह्वा का प्रत्यक्ष दमन और मेधा की आवाज़ की संस्थागत उपेक्षा अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है, लेकिन दोनों के पीछे स्त्री की स्वतंत्र क्षमता को नियंत्रित करने वाली मानसिकता मौजूद है। इस प्रकार नाटक ऐतिहासिक दमन और आधुनिक संस्थागत असमानता के बीच एक वैचारिक सेतु निर्मित करता है।

पितृसत्ता और स्त्री के अधिकारों का हनन

          इसमें स्त्री मानवाधिकारों का संकट मूलतः पितृसत्तात्मक सत्ता-संरचना से जुड़ा है। यह व्यवस्था केवल पुरुषों के व्यक्तिगत व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार, परंपरा, सामाजिक प्रतिष्ठा, नैतिकता और संस्थागत संरचनाओं में भी दिखाई देती है। स्त्री से त्याग, मौन और समर्पण की अपेक्षा करना तथा उसके निर्णय और स्वतंत्रता को संदेह की दृष्टि से देखना इसी मानसिकता के रूप हैं। नाटक यह भी संकेत करता है कि सामाजिक संस्कार इतने प्रभावशाली हो सकते हैं कि स्त्रियाँ भी कभी-कभी इन्हीं मानदंडों को स्वीकार कर लेती हैं और अपनी इच्छाओं को सीमित करने लगती हैं। इसलिए स्त्री मानवाधिकारों की वास्तविक स्थापना केवल बाहरी कानूनों या संस्थागत प्रावधानों से संभव नहीं है। इसके लिए सामाजिक चेतना और लैंगिक मानसिकता में परिवर्तन भी आवश्यक है।

नेपथ्य’ से ‘मंच’ तक: अधिकार-बोध की यात्रा

          नाटक का शीर्षक स्त्री मानवाधिकारों के संदर्भ में और अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है। नेपथ्य’ उस अदृश्य सामाजिक स्थिति का प्रतीक है जहाँ स्त्री की उपस्थिति तो रहती है, लेकिन उसे निर्णय, ज्ञान और अभिव्यक्ति के केंद्र से बाहर रखा जाता है। इसके विपरीत मंच’ समान सार्वजनिक उपस्थिति और अधिकार-बोध का प्रतीक है। यह नेपथ्य है... इसे मंच तक पहुँचने में समय लगेगा - इस कथन में नाटक के शीर्षक का वास्तविक अर्थ और अधिक गहरा हो जाता है। ‘नेपथ्य’ यहाँ केवल रंगमंच के पीछे का स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक अदृश्यता का रूपक है।

          इसलिए ‘नेपथ्य से मंच तक’ की यात्रा केवल दृश्यता की यात्रा नहीं है। यह - मौन से अभिव्यक्ति तक, असमानता से समानता तक , पराधीनता से स्वायत्तता तक, और अदृश्यता से गरिमापूर्ण सार्वजनिक उपस्थिति तक की यात्रा है। खना की चेतना और मेधा का संघर्ष इस यात्रा को ऐतिहासिक निरंतरता प्रदान करते हैं।

स्त्री मानवाधिकार और पीढ़ीगत चेतना

          नाटक में अतीत और वर्तमान को जोड़ने वाली माँ और दादी की उपस्थिति यह संकेत करती है कि स्त्री के अधिकारों का संघर्ष पीढ़ियों से चला आ रहा है। खना की कथा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान स्त्री के अनुभव को समझने का माध्यम बनती है। समय के साथ स्त्री की स्थिति में परिवर्तन अवश्य हुआ है। शिक्षा, रोजगार और सामाजिक गतिशीलता ने उसके लिए नए अवसर खोले हैं। फिर भी यदि मानसिकता में समानता का भाव विकसित नहीं होता, तो अधिकारों का वास्तविक उपयोग अधूरा रह जाता है। इस प्रकार नाटक यह संदेश देता है कि अधिकारों की प्राप्ति केवल बाहरी स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि अधिकार-बोध और आत्मसम्मान से भी जुड़ी है।

निष्कर्ष

          मीरा कांत का नेपथ्य राग’ स्त्री मानवाधिकारों के विविध आयामों को ऐतिहासिक और समकालीन संदर्भों में अभिव्यक्त करने वाला महत्त्वपूर्ण नाटक है। खना और मेधा के ज़रिये समानता, शिक्षा और ज्ञान, बौद्धिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा, स्वायत्तता, सार्वजनिक जीवन में सहभागिता तथा कार्यस्थल पर समान अवसर जैसे स्त्री मानवाधिकारों के प्रश्न उभरते हैं। खना का संघर्ष उस समय की प्रत्यक्ष और कठोर पितृसत्तात्मक व्यवस्था को सामने लाता है, जबकि मेधा का संघर्ष आधुनिक संस्थागत जीवन में मौजूद लैंगिक असमानता के सूक्ष्म रूपों को उजागर करता है। दोनों के बीच की समानता यह सिद्ध करती है कि स्त्री-अधिकारों का संघर्ष केवल किसी एक युग की समस्या नहीं है; यह ऐतिहासिक निरंतरता वाला सामाजिक प्रश्न है। खना की जिह्वा का कटना इस संघर्ष का सबसे प्रभावशाली प्रतीक है। यह केवल शारीरिक हिंसा नहीं, बल्कि स्त्री के विचार, ज्ञान और अभिव्यक्ति के अधिकार पर नियंत्रण का प्रतीक है। दूसरी ओर, उसका ज्ञान और चेतना यह सिद्ध करते हैं कि आवाज़ को दबाया जा सकता है, किंतु विचार को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।

          अंततः ‘नेपथ्य राग’ यह स्थापित करता है कि स्त्री मानवाधिकारों की वास्तविक स्थापना तब होगी जब स्त्री को केवल मंच पर स्थान नहीं, बल्कि अपनी आवाज़, अपनी बुद्धि, अपनी पहचान और अपने निर्णय के साथ मंच पर खड़े होने का अधिकार प्राप्त होगा। खना से मेधा तक की यात्रा इसी अधिकार-बोध की यात्रा है। एक ऐसी यात्रा जो नेपथ्य से आरंभ होकर समानता, गरिमा और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मंच तक पहुँचने की निरंतर आकांक्षा को व्यक्त करती है। बहरहाल ‘नेपथ्य राग’ स्त्री की करुण कथा मात्र नहीं, बल्कि उसके मानवीय अधिकारों की पहचान, उनके हनन के प्रतिरोध और गरिमापूर्ण अस्तित्व की पुनर्स्थापना का सशक्त नाट्य-विमर्श है।

 

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